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खेलकूद प्रतियोगिता व सांस्कृतिक कार्यक्रम का किया गया आयोजन

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नीरजा चौधरी का कॉलम:क्या विपक्ष को ‘इंडिया’ से परे विकल्प खोजने चाहिए?

हाल ही में ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करने की मांग ने नई बहस को जन्म दे दिया। बहस इस सवाल के इर्द-गिर्द केंद्रित है कि यह समूह अब तक अपना नेता क्यों नहीं चुन पाया। 2023 में इसके गठन के बाद से तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन 26 सदस्यीय इस गठबंधन के लिए यह बुनियादी महत्व का ही काम अब तक अधूरा है। यहां तक कि एक संयोजक भी गठबंधन में नई ऊर्जा भर सकता है और उसे दिशा दे सकता है। दूसरा सवाल इस बिंदु से जुड़ा है कि अपने अंतर्विरोधों के बावजूद मौजूदा रूप में इंडिया समूह की प्रासंगिकता क्या है और क्या यह एनडीए को चुनौती देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। तीसरा सवाल- जिस पर खुलकर कम चर्चा होती है- यह है कि क्या विपक्ष के पास इंडिया के अलावा और भी ऐसे रास्ते हैं, जिनसे वह एनडीए का मुकाबला कर सके। कारण, विपक्षी दलों की अपनी सीमाएं और क्षेत्रीय टकराव हैं। ऐसे में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या क्षेत्रीय दलों को अपने स्तर पर एक अलग विकल्प या संघीय मोर्चा (फेडरल फ्रंट) बनाने की दिशा में बढ़ने की जरूरत है? इंडिया गठबंधन का अब तक कोई नेता इसलिए नहीं चुना जा सका है क्योंकि किसी नाम पर सहमति नहीं बन पाई है। ममता को इंडिया ब्लॉक का नेता बनाने का विचार सबसे पहले संजय बारू ने सामने रखा था, जो मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके हैं। बाद में इसे टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने भी उठाया। लेकिन यह प्रस्ताव कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं है। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस नेता चाहते हैं कि राहुल गांधी ही यह भूमिका निभाएं। ममता बनर्जी क्षेत्रीय नेता हैं। उनकी पार्टी के पास लोकसभा में 29 सीटें हैं। दूसरी ओर, गिरावट के बावजूद कांग्रेस के पास लोकसभा में अभी भी 101 सीटें हैं और उसकी मौजूदगी पूरे देश में है। क्षेत्रीय दलों को स्वाभाविक रूप से यह अधिक स्वीकार्य होगा कि इंडिया का नेतृत्व किसी राज्य-स्तरीय क्षत्रप के हाथ में हो। भाजपा की राजनीति का विरोध करने के बावजूद उन्हें आशंका है कि अगर गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में जाता है तो कांग्रेस का पुनरुत्थान शुरू हो सकता है- और इसकी कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ेगी। वर्षों में इन क्षेत्रीय दलों का विस्तार कांग्रेस की कीमत पर ही हुआ है। ममता का नाम इंडिया के संभावित नेता के रूप में बार-बार इसलिए उभरता है, क्योंकि उनके पास राजनीतिक उपलब्धियों का ठोस रिकॉर्ड है। 1999 में उन्होंने टीएमसी बनाई और धीरे-धीरे बंगाल में कांग्रेस की जगह ले ली। 2011 में उन्होंने अकेले दम पर उस वामपंथी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया, जो राज्य में 33 वर्षों से अधिक समय से जमी हुई थी। लेकिन समस्या यह है कि उनकी राजनीतिक पूंजी मुख्यतः एक ही राज्य तक सीमित है, उसके बाहर नहीं। कांग्रेस को ममता- या किसी भी अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप के नेतृत्व को लेकर जो आपत्तियां हैं, उसी से सवाल उठता है कि क्या क्षेत्रीय दल किसी फेडरल फ्रंट के रूप में साथ आ जाएं और कांग्रेस को अपने रास्ते पर चलने दें? अतीत में भी ऐसे विचार सामने आते रहे हैं। कांग्रेस खुद दुविधा में है। एक तरफ वह अपने दम पर आगे बढ़कर खुद को पुनर्जीवित करना चाहती है और दूसरी तरफ भाजपा को हराने के बड़े लक्ष्य के लिए क्षेत्रीय दलों की मांगों के साथ समझौता करने का दबाव भी है। जहां तक 2029 तक होने वाले विधानसभा चुनावों का सवाल है, वहां सीटों के तालमेल आम तौर पर राज्य स्तर पर ही तय होते हैं। उदाहरण के लिए यूपी में यह बातचीत राहुल और अखिलेश यादव के बीच होगी। उसमें ममता की कोई भूमिका नहीं होगी। इसी तरह यह भी संभव नहीं कि अखिलेश, ममता को बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए राजी करा सकें। अतीत में भी क्षेत्रीय दल (कुछ मध्यमार्गी दलों के साथ) मिलकर मोर्चा बना चुके हैं, जिसे राष्ट्रीय मोर्चा कहा गया था। इसका गठन वीपी सिंह ने किया था और 1989 में वे राजीव गांधी को सत्ता से हटाते हुए केंद्र में सरकार बनाने में सफल रहे थे। 1996 में वे एक कदम आगे बढ़े, जब केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी- इस बार कांग्रेस के समर्थन से। उस समय इसे मुख्यमंत्रियों की सरकार कहा गया था, क्योंकि इसमें शामिल कई नेता राज्यों के दलों के प्रमुख और प्रभावशाली क्षेत्रीय चेहरे थे। लेकिन अभी तक तो क्षेत्रीय दलों का कोई मोर्चा अपने दम पर केंद्र में सत्ता तक नहीं पहुंचा है- 1989 में उसे कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा और वाम दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ी थी या फिर 1996-97 में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के समर्थन की। क्षेत्रीय दलों को आशंका है कि गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में जाता है तो कांग्रेस का पुनरुत्थान शुरू हो सकता है- और इसकी कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ेगी। इन क्षेत्रीय दलों का विस्तार कांग्रेस की कीमत पर ही हुआ है।(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

John Doe

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