Kohdi Farming: किसान योगेंद्र सिंह ने बताया कि एक बीघा 20 बिस्वा जमीन में कोहड़ी की खेती किया है. लागत कोहड़ी की खेत में बहुत कम है और मुनाफा तगड़ा है. कोहडी की खेती में एक हजार का बीज लग जाता है, जो लगभग 100 ग्राम आता है. बाकी जुताई का खर्च है. मेड़ का खर्च है. दो हजार रुपये जुताई और बुआई वगैरह का खर्च है. एक बीघा 20 जमीन में कुल तीन हजार की लागत आती है. अभी तक तो मात्र मैंने पांच हजार की बिक्री की है. तीन जून को लगाया था. हालांकि, बारिश की वजह से थोड़ा नुकसान हुआ है.
उत्तर बस्तर कांकेर कलेक्टर एवं जिला अभिहित अधिकारी श्री कुंदन कुमार के निर्देशन में ‘बने खाबो, बने रहिबो 2.0’ अभियान के तहत आगामी त्यौहारों को दृष्टिगत रखते हुए खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा जिले के विभिन्न खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण एवं खाद्य पदार्थों का नमूना संग्रहण किया जा रहा है। अनियमितता पाए जाने पर संबंधित प्रतिष्ठानों [...]
नई दिल्ली. कैंसर के इलाज के क्षेत्र में भारत में एक नई तकनीक को लेकर उम्मीद जगी है. केंद्र सरकार ने गुरुवार को एक ऐसी ‘स्मार्ट’ कैंसर दवा RK-251 के बारे में जानकारी दी, जिसे इस तरह विकसित किया गया है कि यह शरीर में सामान्य कोशिकाओं के बीच निष्क्रिय रहे और कैंसर कोशिकाओं के भीतर पहुंचने के बाद ही सक्रिय होकर अपना असर दिखाए. सरकार के मुताबिक इस तकनीक का उद्देश्य कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाते हुए स्वस्थ कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को कम करना है, जो पारंपरिक कीमोथेरेपी की बड़ी चुनौतियों में शामिल है. सरकार के अनुसार RK-251 पर यह शोध इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IASST) के डॉ. असीस बाला और आईआईटी गुवाहाटी के डॉ. केपी भाबक के नेतृत्व में किए गए सहयोगात्मक अनुसंधान का परिणाम है. हालांकि अभी इसे मरीजों पर इस्तेमाल करने की स्थिति नहीं आई है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस तकनीक को मानव परीक्षण तक पहुंचाने से पहले आगे कई स्तरों पर अध्ययन और वैधता जांच की आवश्यकता होगी. सरकार ने बताया कि मौजूदा कैंसर उपचार में कीमोथेरेपी का इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जाता है, लेकिन इसकी एक बड़ी समस्या यह है कि कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाने के साथ-साथ शरीर की कुछ स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित हो सकती हैं. इसके कारण मरीजों को उपचार के दौरान विभिन्न दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है. इसी वजह से ऐसी लक्षित उपचार पद्धतियों पर लगातार काम हो रहा है, जिनमें दवा सामान्य ऊतकों में कम सक्रिय रहे और ट्यूमर के आसपास या कैंसर कोशिकाओं के भीतर पहुंचने के बाद ही अपना प्रभाव दिखाए. RK-251 को इसी अवधारणा पर तैयार किया गया है. सरकार के मुताबिक कैंसर कोशिकाओं में अक्सर सामान्य कोशिकाओं की तुलना में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज यानी ROS का स्तर अधिक पाया जाता है. ये ऐसे अणु होते हैं जो कोशिकाओं में रासायनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं. वैज्ञानिकों ने इसी अंतर को RK-251 की कार्यप्रणाली का आधार बनाया है. सरकार के मुताबिक जब RK-251 कैंसर कोशिका के भीतर पहुंचता है और वहां मौजूद ROS के उच्च स्तर के संपर्क में आता है, तो दवा सक्रिय हो जाती है. सक्रिय होने के बाद यह NBDHEX नामक शक्तिशाली एंटी-कैंसर यौगिक को रिलीज करती है. यह यौगिक ऐसे लक्षित प्रोटीनों को ब्लॉक करता है, जिनका इस्तेमाल कई कैंसर कोशिकाएं जीवित रहने और उपचार के प्रभाव से बचने के लिए करती हैं. इस तरह दवा का डिजाइन सामान्य कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं के बीच मौजूद जैविक अंतर का इस्तेमाल करने पर आधारित है. इसका उद्देश्य यह है कि दवा शरीर में पहुंचने के बाद हर जगह समान रूप से सक्रिय न हो, बल्कि कैंसर कोशिका के भीतर मौजूद विशेष परिस्थितियों के कारण वहीं सक्रिय होकर कैंसररोधी प्रभाव पैदा करे. सरकार ने बताया कि प्री-क्लिनिकल अध्ययनों में RK-251 ने विशेष रूप से आक्रामक ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर कोशिकाओं के खिलाफ मजबूत गतिविधि दिखाई. अध्ययन के दौरान स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका प्रभाव तुलनात्मक रूप से काफी कम पाया गया. यह शुरुआती परिणाम वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर को उपचार की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण कैंसर प्रकारों में गिना जाता है. हालांकि सरकार ने इन शुरुआती परिणामों को लेकर सावधानी भी बरती है. RK-251 का अभी मानव मरीजों में परीक्षण नहीं हुआ है. सरकार के मुताबिक प्री-क्लिनिकल अध्ययन में मिले परिणामों को सीधे मरीजों के इलाज की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता. किसी नई दवा को मरीजों के इस्तेमाल तक पहुंचने से पहले उसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता, उचित खुराक और संभावित दुष्प्रभावों की विस्तृत जांच आवश्यक होती है. RK-251 के व्यवहार का अध्ययन जेब्राफिश भ्रूणों में भी किया गया. सरकार के मुताबिक इस अध्ययन के दौरान दवा में स्पष्ट विषाक्तता के संकेत नहीं मिले. अध्ययन में ROS की मौजूदगी में दवा की अपेक्षित फ्लोरेसेंस गतिविधि भी दिखाई दी. वैज्ञानिकों के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण है कि दवा अपने डिजाइन के अनुरूप विशेष परिस्थितियों में सक्रिय हो सकती है. हालांकि इसे मानव शरीर में सुरक्षित और प्रभावी साबित करने के लिए अभी आगे के अध्ययन जरूरी हैं. सरकार ने कहा कि कैंसर के उपचार में लक्षित दवाओं की जरूरत इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि पारंपरिक उपचार पद्धतियों के दौरान स्वस्थ कोशिकाओं को होने वाला नुकसान मरीजों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. यदि कोई दवा कैंसर कोशिकाओं को अधिक सटीक तरीके से निशाना बनाने में सक्षम होती है तो भविष्य में उपचार के दौरान होने वाले कुछ दुष्प्रभावों को कम करने की संभावना पैदा हो सकती है. भारत में कैंसर का बढ़ता बोझ भी इस तरह के अनुसंधान की आवश्यकता को रेखांकित करता है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल 14 लाख से अधिक नए कैंसर मामले सामने आते हैं और सात लाख से अधिक मौतें दर्ज होती हैं. स्तन कैंसर, मुंह का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और कोलोरेक्टल कैंसर देश में प्रमुख कैंसर प्रकारों में शामिल हैं. तंबाकू का सेवन, जीवनशैली और खान-पान जैसे कई कारकों को विभिन्न कैंसर के जोखिम से जोड़ा जाता है. RK-251 को लेकर सरकार की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब दुनिया भर में कैंसर के उपचार को अधिक लक्षित और व्यक्तिगत बनाने की दिशा में तेजी से शोध हो रहा है. कैंसर कोशिकाओं की जैविक विशेषताओं का इस्तेमाल कर दवा को सक्रिय करने की रणनीति इसी व्यापक वैज्ञानिक प्रयास का हिस्सा है. हालांकि इसे फिलहाल कीमोथेरेपी का तत्काल विकल्प कहना जल्दबाजी होगी. किसी नई दवा की वास्तविक उपयोगिता तभी स्पष्ट होती है जब वह प्रयोगशाला और पशु आधारित अध्ययनों के बाद मानव क्लिनिकल ट्रायल में भी सुरक्षित और प्रभावी साबित हो. इसके बाद नियामकीय मंजूरी और बड़े पैमाने पर परीक्षण की प्रक्रिया पूरी होती है. सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि RK-251 के मरीजों में परीक्षण से पहले अभी और शोध एवं वैलिडेशन की आवश्यकता है. इसलिए फिलहाल इसे कैंसर उपचार की संभावित नई तकनीक के रूप में देखा जा रहा है, न कि उपलब्ध उपचारों का स्थापित विकल्प. फिर भी RK-251 की खासियत यह है कि इसमें दवा को कैंसर कोशिका के अंदर मौजूद ROS के उच्च स्तर के आधार पर सक्रिय करने की रणनीति अपनाई गई है. यदि आगे के अध्ययनों और मानव परीक्षणों में इसके सुरक्षा और प्रभावशीलता संबंधी दावे सही साबित होते हैं, तो भविष्य में यह अधिक लक्षित कैंसर उपचार विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. फिलहाल वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य इसके तंत्र, सुरक्षा और कैंसररोधी प्रभाव को व्यापक अध्ययनों के जरिए प्रमाणित करना होगा.
Indian News 20 द्वारा इस दिन पोस्ट की गई रविवार, 13 दिसंबर 2020
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