NIT Agartala: एनआईटी अगरतला भारत के पॉपुलर इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट में से एक है. यहां बीटेक कोर्स में एडमिशन लेने के लिए JEE Main एग्जाम पास करना पड़ता है. Google और Amazon जैसी टॉप कंपनी यहां स्टूडेंट्स को प्लेसमेंट ऑफर देने के लिए आती है. The post इस NIT में इंजीनियरिंग का मौका, जहां Google और Amazon से मिलता है जॉब appeared first on Prabhat Khabar.
Nishant Kumar Age:नीतीश कुमार के बेटे जो पहले एक्टिव पॉलिटिक्स से दूर रहे थे अब पॉलिटिक्स में आ गए हैं. वे हाल ही में ऑफिशियली जेडीयू में शामिल हुए हैं. नीतीश ने राज्यसभा में जाने का ऐलान किया है.
टी-20 विश्व कप में भारत की जीत को अगर हम सिर्फ स्कोरबोर्ड की नजर से देखें, तो इसके असली मायनों को चूक जाएंगे। यह जीत भारतीय क्रिकेट के भीतर आ रहे एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह सिर्फ 11 खिलाड़ियों की टीम की नहीं, बल्कि उस नए सिस्टम की जीत है, जो पिछले कुछ वर्षों में तैयार हुआ है। लंबे समय तक भारतीय क्रिकेट सुपरस्टार खिलाड़ियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। कभी यह टीम सचिन तेंदुलकर के नाम से जानी गई, कभी सौरव गांगुली के नेतृत्व ने इसे पहचान दी, फिर महेंद्र सिंह धोनी और उसके बाद रोहित शर्मा जैसे कप्तानों के दौर में टीम की पहचान अकसर एक व्यक्ति से जुड़ जाती थी। 1983 का विश्व कप आज भी कपिल की टीम के नाम से याद किया जाता है। 2007 और 2011 की टीमें धोनी की टीमें कहलाईं। पिछले कुछ वर्षों में रोहित की टीम शब्द भी बार-बार सुनाई देता रहा। लेकिन इस बार तस्वीर बदल गई है। इस टीम में कोई ऐसा सुपरस्टार नहीं है, जिसकी छवि बाकी खिलाड़ियों से कई गुना बड़ी हो। इस टीम में युवा खिलाड़ी हैं, प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं, लेकिन कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो पूरी टीम पर हावी हो। ये खिलाड़ी शायद विज्ञापनों में कम दिखते हों, लेकिन मैदान पर सही समय पर कमाल जरूर दिखाते हैं। यही इस जीत की सबसे बड़ी खासियत है। भारतीय क्रिकेट अब सुपरस्टार संस्कृति से आगे बढ़कर टीम संस्कृति की तरफ जा रहा है, जहां जीत का श्रेय किसी एक खिलाड़ी को नहीं, पूरे सिस्टम को मिलता है। इस बदलाव का एक और दिलचस्प पहलू है। पहली बार ऐसा हुआ है कि टीम का सबसे बड़ा चेहरा कोई खिलाड़ी या कप्तान नहीं, बल्कि टीम का कोच बन गया है। और वो पोस्टर बॉय हैं- गौतम गंभीर। फुटबॉल की दुनिया में यह मॉडल काफी पुराना है। वहां बड़े क्लबों की पहचान उनके मैनेजर से होती है। भारतीय क्रिकेट में यह सोच अब दिखाई देने लगी है। गौतम गंभीर ने जब टीम की कमान कोच के रूप में संभाली, तो उन्होंने शुरुआत में ही एक बात साफ कर दी थी- अब टीम में जगह नाम से नहीं, बल्कि प्रदर्शन से मिलेगी। पहले ऐसा होता था कि बड़े खिलाड़ियों को ड्रॉप करने में चयनकर्ताओं, कप्तान और कोच के हाथ फूल जाते थे। लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है। गौतम गंभीर ने ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश की, जहां टीम किसी एक स्टार पर निर्भर न रहे। जहां हर खिलाड़ी यह समझे कि अगर वह अच्छा प्रदर्शन नहीं करेगा, तो उसकी जगह लेने के लिए कई खिलाड़ी तैयार बैठे हैं। यह सोच उनके अपने अनुभव से भी निकली है। 2011 के विश्व कप फाइनल को याद कीजिए। उस मैच में गौतम गंभीर ने 97 रन की बेहद महत्वपूर्ण पारी खेली थी। लेकिन उस जीत की चर्चा में अकसर धोनी के छक्के और उनकी कप्तानी का ही जिक्र होता है। टी-20 विश्व कप में भी संजू सैमसन की तीन पारियों को देखिए- 97, 89, 89... हर बार वो शतक के इतने नजदीक आए, लेकिन उन्होंने निजी रिकॉर्ड बनाने के लिए रन रेट को गिरने नहीं दिया और एक भी बॉल खराब नहीं की। पहले बड़े खिलाड़ी शतक के करीब पहुंचकर बड़े शॉट्स छोड़कर सिंगल लेकर पहले अपना शतक पूरा करते थे, लेकिन अब 99 पर पहुंचकर भी ये नए खिलाड़ी छक्के या चौके के बारे में सोचते हैं। गौतम गंभीर ने कई बार कहा है कि क्रिकेट एक टीम गेम है और जीत का श्रेय किसी एक खिलाड़ी को नहीं दिया जाना चाहिए। आज जब वे भारतीय टीम के कोच हैं तो उन्होंने उसी सोच को टीम की संस्कृति का हिस्सा बनाने की कोशिश की है। हालांकि यह बदलाव आसान नहीं था। जब टीम हारती थी तो सबसे पहले गंभीर को ही निशाने पर लिया जाता था। सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना होती थी और कई बार यह कहा गया कि वह टीम को गलत दिशा में ले जा रहे हैं। लेकिन बड़ी योजनाओं के परिणाम कभी भी रातों-रात नहीं मिलते। आज भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है, जिसके पास टेस्ट, वनडे और टी-20 के लिए अलग-अलग मजबूत टीमें तैयार हैं। इतना ही नहीं, भारतीय क्रिकेट के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर के करीब 100 खिलाड़ियों का विशाल टैलेंट पूल भी मौजूद है। यह स्थिति अचानक नहीं बनी है। बीसीसीआई ने बेंगलुरु में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया, जहां खिलाड़ियों को आधुनिक ट्रेनिंग और तकनीक की सुविधाएं मिलती हैं। घरेलू क्रिकेट की प्राइज मनी को लगभग 300 प्रतिशत तक बढ़ाया गया। महिला क्रिकेट को भी पुरुष क्रिकेट के बराबर महत्व दिया गया और आईपीएल की तरह महिला प्रीमियर लीग शुरू की गई। और आज स्थिति यह है कि भारत पुरुष और महिला दोनों क्रिकेट में विश्व चैंपियन है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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