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Bareilly News: प्रज्ञा प्रवाह के आगामी कार्यक्रम पर किया मंथन

प्रज्ञा प्रवाह के आगामी कार्यक्रम पर किया मंथन

जिलाधिकारी ने केन बेतवा लिंग परियोजना का किया निरीक्षण

बांदा। जिलाधिकारी बाँदा जे.रीभा ने आज केन बेतवा लिंक परियोजना की मुख्य केन नहर के निर्माणाधीन कार्य का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण में उन्होंने केन मुख्य नहर में किये जा रहे कार्यों का निरीक्षण करते हुए सम्बन्धित अधिशाषी अभियंता को निर्देश दिये कि निर्माण कार्य को गुणवत्ता के साथ तेज गति से पूर्ण किया जाए। उन्होंने नहर के ऊपर निर्माणाधीन पुल/रपटों का निरीक्षण किया एवं निर्माणाधीन सामग्री को चेक करते हुए निर्माण कार्य को समय से गुणवत्ता के साथ पूर्ण करने के निर्देश दिये।

Varun Dhawan Daughter DDH Disease: किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?

Varun Dhawan Daughter DDH Disease: बॉलीवुड के फेमस एक्टर वरुण धवन ने हाल ही में अपनी बेटी की एक स्वास्थ्य समस्या के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को हिप डिस्प्लेसिया यानी डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) है. यह खबर सुनते ही लोगों में इस बीमारी के बारे में जानने की इच्छा बढ़ गई.

यह समस्या बहुत आम नहीं मानी जाती, लेकिन यह बच्चों में होने वाली हिप जॉइंट (hip joint) की एक गंभीर समस्या है. अगर समय पर इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता पर असर डाल सकती है और भविष्य में दर्द, चलने में परेशानी या जल्दी गठिया (arthritis) जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि DDH क्या है, इसके लक्षण, कारण और इलाज कैसे किया जाता है. यह कितनी खतरनाक है.

DDH क्या है?

डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे की हिप जॉइंट सही तरीके से विकसित नहीं होती है. सामान्य स्थिति में, जांघ की हड्डी का ऊपर वाला हिस्सा हिप सॉकेट में मजबूती से फिट होता है. DDH में यह फिटिंग ढीली, अस्थिर या कभी-कभी पूरी तरह से डिस्लोकेट (dislocated) हो जाती है. यह समस्या जन्म के समय हमेशा दिखती नहीं है, इसलिए बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो बच्चे नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं और चलने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं होती है.

यह बीमारी कितनी आम है?

दुनियाभर में करीब 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत बच्चों को यह समस्या होती है. कुछ मामलों में हल्की अस्थिरता अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ बच्चों को इलाज की जरूरत पड़ती है. भारत में हर 1000 बच्चों में 0 से 2.6 मामलों की संभावना होती है. यह आंकड़ा सही से पता नहीं होता, क्योंकि हल्के मामलों में यह अनदेखी हो जाती है. इस बीमारी से लड़कियां, पहली बार जन्मे बच्चे, ब्रीच पोजीशन में जन्मे बच्चे या परिवार में किसी को DDH का इतिहास वाले लोग ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. भारत में ज्यादातर बच्चे 1 या 2 साल की उम्र में ही डायग्नोस होते हैं, जो सही उम्र से काफी लेट है. इसलिए न्यू बोर्न बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है ताकि समस्या का सही समय पर पता चल सके और इलाज शुरू हो सके.

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इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?

न्यू बोर्न बेबी में अक्सर नियमित चेकअप के दौरान डॉक्टर इस समस्या को पहचान लेते हैं. बच्चे के पेरेंट्स अक्सर शुरू में कोई संकेत नहीं देखते है. थोड़े बड़े बच्चों में पैरों की लंबाई असमान होना, एक पैर का सीमित हिलना या घुटनों के मुड़ने में दिक्कत और जांघ के झुर्री (thigh folds) में असमानता दिखाई दे सकते हैं. देर से पता चलने वाले मामलों में बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं, लंपिंग करते हैं, असामान्य चाल रखते हैं या एक पैर छोटा दिख सकता है.

DDH का इलाज

DDH का इलाज संभव है और यह अक्सर पूरी तरह ठीक हो जाता है, खासकर अगर समय पर पहचान हो. न्यू बोर्न बेबी का इलाज सॉफ्ट ब्रेस का यूज करके हिप को सही जगह पर रखा जाता है ताकि हिप सामान्य रूप से विकसित हो. वहीं 6 महीने से 2 साल के बच्चे का इलाज क्लोज्ड रिडक्शन (closed reduction) से किया जाता है, यानी बिना ऑपरेशन के हिप को सही जगह पर लाया जाता है. इसके बाद कास्ट में रखा जाता है. 2 साल से बड़े बच्चों में सर्जरी की जरूरत हो सकती है, जिसमें हिप को सही स्थिति में लाया जाता है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो ज्यादातर बच्चों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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