खारुन नदी के किनारे प्रदूषण की यह कहानी नई नहीं है, लेकिन इस बार तस्वीर ज्यादा खतरनाक है। केडिया शराब फैक्ट्री से निकलने वाला अपशिष्ट अब सीधे नदी तक सीमित नहीं रहा; अवैध मुरुम खनन से बने गहरे गड्ढे ‘जहरीले जलाशय’ बन चुके हैं। प्रदेश में सबसे अधिक पैसा कमाने वाली इस फैक्ट्री ने आसपास के लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। लेकिन रोजगार व शराब की वजह से यहां कोई विरोध नहीं करता, जब दैनिक भास्कर टीम यहां पहुंची तो यहां इतनी दुर्गंध थी कि सांस लेना मुश्किल था। आसपास कई तालाब नजर आए। पड़ताल के दौरान लोगों ने बताया कि यह तालाब नहीं है खनन माफिया के मुरुम निकालने के सबूत है। यहां बड़े पैमाने पर माफियाओं ने अवैध खनन कर गड्ढे छोड़ दिए थे। अब इन्हीं में डिस्टलरी का गंदा विषैला पानी जमा हो गया है, जहरीले जलाशय जब टीम आगे बढ़ी तो एक सूखा नाला मिला, इससे भी बहुत बदबू आ रही है। थोड़ी दूरी पर नाला बन चुकी खारून नदी दिखी। यह नदी काली हो चुकी है। इंसान तो छोड़िए कोई जानवर भी यह पानी नहीं पीता है। अवैध खनन से बने जलाशय बड़ा खतरा, नदी काली; बदबू से जीना मुश्किल नकली शराब में फंस चुके हैं केडिया फैक्ट्री संचालक नवीन केडिया का नाम शराब घोटाले में भी जुड़ा है। आरोप है कि डिस्टलरी ने नकली होलोग्राम वाली शराब सप्लाई कर करोड़ों का कमीशन लिया। फरवरी 2024 में एसीबी ने छापा मारा था। जनवरी 2026 में केडिया को झारखंड और छत्तीसगढ़ के शराब घोटालों के सिलसिले में हिरासत में लिया गया है। अभी वे जेल में हैं। गड्ढे में जा चुकी है 15 लोगों की जान अवैध मुरुम खनन से बने जहरीले जलाशय ने 15 लोगों की जान ले ली। 9 अप्रैल 2024 को कर्मचारियों से भरी बस 50 फीट गहरी खदान में गिरी। बाद में 10-10 लाख मुआवजा व नौकरी के वादे से मामला दबा दिया गया। भास्कर एक्सपर्ट - प्रोफेसर शम्स परवेज, केमिस्ट्री विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय जहरीला स्पेंट वॉश: ज्यादा केमिकल होने से पानी में खत्म कर रहा जीवन डिस्टलरी के स्पेंट वॉश में भारी मात्रा में ऑर्गेनिक और अकार्बनिक केमिकल होते हैं। इसमें बीओडी और सीओडी 50 से 90 हजार मिग्रा प्रति लीटर तक होता है, जबकि मानक 30-250 मिग्रा है। यह अम्लीय, लाल रंग का पानी मिट्टी को क्षति पहुंचाकर भूजल में मिल जाता है, जिससे घुलित ऑक्सीजन खत्म हो जाती है। ऐसे पानी में जीवन समाप्त हो जाता है और यह कुछ ही घंटों में सड़ने लगता है। उदाहरण के तौर पर एक सामान्य जगह पानी बाल्टी में रखेंगे तो दो-चार घंटे में खराब हो जाता है। ^मैं मौके पर टीम को भेजकर जांच करवा लेता हूं। अगर कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो कार्रवाई की जाएगी। -प्रमेंद्र पांडेय, क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी, दुर्ग
वाणिज्यिक गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने से खाने-पीने की चीजें महंगी हो गई हैं. रेस्टोरेंट, ढाबे, स्ट्रीट फूड और यहां तक कि शादी-विवाह में कैटरिंग सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं. आम लोगों की जेब पर इसका सीधा असर पड़ रहा है, जिससे उन्हें अपने बजट में कटौती करनी पड़ रही है.
डूंगरपुर| प्रदेश सरकार की राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (आरजीएचएस) अब जिले में गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। करीब 9 महीने से 25 करोड़ रुपए अटके होने के कारण 1 निजी अस्पताल और 20 अधिकृत मेडिकल व्यापारियों ने योजना के तहत सेवाएं देना लगभग बंद कर दिया है। इसका सीधा असर जिले के हजारों मरीजों, खासकर बुजुर्ग पेंशनरों पर पड़ रहा है, जिन्हें अब इलाज और दवाओं के लिए जेब से भुगतान करना पड़ रहा है। निजी अस्पतालों ने 13 अप्रैल से केशलैस उपचार बंद कर दिया है। संचालकों का कहना है कि सरकार से भुगतान नहीं मिलने के कारण अब उधार में इलाज संभव नहीं है। ऐसे में मरीजों को या तो भर्ती से मना किया जा रहा है या पूरी राशि नकद जमा कराने को कहा जा रहा है। सिर्फ अस्पताल ही नहीं, अधिकृत मेडिकल स्टोर्स ने भी दवाइयां देना सीमित कर दिया है। मरीजों का कहना है कि डॉक्टर से लिखी गई 4-5 दवाओं में से केवल 1-2 दवाएं ही योजना के तहत मिल रही हैं। बाकी दवाएं बाजार से खरीदनी पड़ रही हैं। मेडिकल व्यापारियों के मुताबिक, लाखों रुपए का बकाया होने के बावजूद उन्हें नाममात्र का भुगतान मिल रहा है। केस 1: शहर के अभय आई क्लिनिक से बताया गया कि लंबे समय से लगभग 50 लाख रुपया बाकी है इसलिए हमारे संस्थान ने आरजीएचएस की सुविधा देना बंद कर दिया है। मरीज केशलैस इलाज के लिए आते है, लेकिन लंबे समय से सुविधा को बंद कर रखा है। पेंशनर समाज के प्रदेश सचिव दिनेश श्रीमाल ने बताया कि आरजीएचएस का सबसे बड़ा उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों को राहत देना था, लेकिन वर्तमान हालात में बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। शहर की सीएचसी में 75 साल से कम उम्र के पेंशनरों की पर्ची तक नहीं काटी जा रही, जबकि पुराने शहर क्षेत्र में ही करीब 2400 पेंशनर निवास करते हैं। इससे उन्हें इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। कई बुजुर्ग मरीजों ने आर्थिक तंगी के चलते इलाज बीच में ही छोड़ दिया, जबकि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के सामने दवाइयों का खर्च उठाना मुश्किल हो गया है। आरजीएचएस का लाभ अब कागजों तक सीमित होकर रह गया है। केस 2: जिले के सागवाड़ा शहर में स्थित एमएम पाटीदार हॉस्पिटल के सह निदेशक रमेश पाटीदार ने बताया कि आरजीएचएस सुविधा में पिछले साल मई माह से अब तक करीब 2 करोड़ रुपए बकाया चल रहा है। हालांकि हॉस्पिटल में मरीजों के इलाज के लिए आरजीएचएस की सुविधा दी जा रही है, लेकिन समय पर राशि नहीं मिलने से असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। केस 3: शहर के रियल मेडिकल के संचालक यतिन जैन ने बताया कि योजना से जिले के 20 से अधिक मेडिकल जुड़े हुए हैं। इनका पिछले वर्ष के मई माह से करीब 20 करोड़ रुपए की राशि का भुगतान नहीं हुआ है। मेडिकल व्यापार को चलाने के लिए राशि की जरूरत होती है। राशि समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को सुविधा नहीं मिल पा रही है। ^शहर की सीएचसी में आरजीएचएस की सुविधा देने के लिए रिपोर्ट बनाकर जयपुर भेज रखी है। इसमें इनकी ऑनलाइन पर्ची नहीं कट रही है। बाकी सीएचसी में प्राथमिक इलाज दिया जा रहा है। -डॉ. अलंकार गुप्ता, सीएमएचओ
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