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एन. रघुरामन का कॉलम:पैसा और त्याग कभी बराबरी से नहीं तौले जा सकते

कई साल पहले मैंने अपने माता-पिता का फ्लैट अपनी बहन को देने का फैसला किया था। जब इस पर सवाल उठे, तो मैंने कहा यह इस बात की ईमानदार स्वीकृति थी कि पिता के गंभीर बीमार होने पर बहन ने ही उनकी देखभाल की थी। अधिकांश परिवारों की तरह हमारे परिवार में भी दो तरह के सिबलिंग्स थे- एक ‘सैटेलाइट चाइल्ड’ यानी मैं- सफल, दूर रहने वाला, पैसे भेजने वाला। और दूसरी ‘केन चाइल्ड’ यानी मेरी बहन- जो पिता को कई बार अस्पताल ले गईं और अंत तक उनकी देखभाल करती रहीं। उसी दौरान उसकी सेहत भी बिगड़ी, जिसकी परेशानियां आज तक बनी हुई हैं। इस हफ्ते की शुरुआत में मुझे अपने जीवन का यह छोटा-सा हिस्सा फिर याद आ गया, जब मुझे मुंबई के एक ऐसे अस्पताल जाना पड़ा, जहां मेरे परिवार के एक सदस्य भर्ती थे। पास के कमरे में एक अन्य महिला भर्ती थीं और उनका बेटा उनकी देखभाल कर रहा था। बगल के कमरे में बैठे-बैठे मैं उस बेटे और विदेश में रहने वाले उसके बड़े भाई की बातचीत सुन सकता था। छोटे बेटे और मां की बातचीत से मुझे समझ आ रहा था कि पैसे बड़ा भाई भेज रहा था और मां की रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी छोटा भाई निभा रहा था। एक बार छोटे भाई ने गुस्से में फोन पर कहा कि हर बात पर यह मत जताया करो कि तुमने इसके लिए पैसे भेजे, उसके लिए पैसे भेजे। जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी, वह फोन लेकर बाहर चला गया। जो मुझे समझ आया, वो यह था कि बड़ा बेटा विदेश में था और शायद सोच रहा था कि मेरी वजह से बिल चुकाए जा रहे हैं; मेरी वजह से मां ठीक से खा रही हैं और उनकी देखभाल हो रही है; मेरी वजह से चीजें ‘हैंडल’ की जा रही हैं। वहीं छोटा बेटा अलग-अलग बातचीत में यह बताते हुए सुना गया कि उसकी मां भूल जाती हैं कि अस्पतालों में कई बार उनके भर्ती रहने के दौरान वही हर समय मौजूद रहा था, लेकिन उन्हें हमेशा याद रहता है कि बड़ा बेटा उनकी देखभाल के लिए पैसे भेजता है। एक बार उन्होंने उसे काट भी लिया था, लेकिन वह उन्हें छोड़ नहीं सकता ​​​था, क्योंकि उनकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं था। इस हफ्ते जब मैं एक रात वहां गया तो मैंने सुना कि छोटा भाई फूट पड़ा और ऊंची आवाज में बोला- भाई, मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूं, क्योंकि तुम्हारे पैसों की वजह से मैं मां को सबसे अच्छा इलाज दिला पा रहा हूं। लेकिन तुम पैसा भेजकर चैन की नींद सो जाते हो, जबकि मैं बीते चार सालों में एक भी रात ठीक से नहीं सो पाया हूं। तुम्हारे पैसे सुबह तीन बजे उनकी चादरें साफ नहीं कर पाते, मैं करता हूं। जैसे ही उसने मुझे बाहर आते देखा, वह अचानक रुक गया। मैं उसे खुलकर बोलने देने के लिए वापस अंदर चला गया। उसने बोलना जारी रखा- भाई, शायद तुम्हें पता भी नहीं कि उन्हें नहलाते समय उठाते हुए मेरी कमर में चोट लग गई थी। डॉक्टर ने बताया कि मुझे हर्नियेटेड डिस्क हो गई है। लेकिन मैं अपने लिए समय ही नहीं निकाल सकता, क्योंकि वे अस्पताल में हैं। तुम्हें अंदाजा नहीं है, भाई। तुम्हारे पैसे उन्हें तब थाम नहीं पाते हैं, जब वे गिर रही होती हैं- यह याद रखना। इतना कहकर उसने फोन काट दिया। वह कितनी सच्ची बात कह रहा था! आज तक किसी ने नहीं सुना कि पैसा डायपर बदल सकता है या अकेलेपन में सहारा दे सकता है। शायद इसी वजह से मुझे अपनी बहन की​ याद आई। जब मैं पिता की दवाइयों के पैसे देता था, तो वही उन्हें दवा खिलाती थी। हो सकता है अंतिम संस्कार का खर्च मैंने उठाया हो, लेकिन आखिरी पल में पिता का हाथ उसने ही थामा था। तब उसने मुझे फोन करके कहा ​था- भाई, मैंने उन्हें जाते हुए देखा। उस दिन मैंने खुद को कोसा। अस्पताल से डिस्चार्ज कराने से ठीक दो घंटे पहले मैं उनके साथ था, लेकिन उनके अं​​तिम क्षण में यह सैटेलाइट सक्सेसफुल चाइल्ड- यानी मैं- वहां मौजूद नहीं था। फंडा यह है कि विरासत का मतलब सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांटना नहीं होता। इसका मतलब यह पहचानना भी होता है कि किसने अपने जीवन में ज्यादा त्याग किए, ताकि कोई और अपना जीवन संवार सके। पैसा और त्याग कभी बराबरी से नहीं तौले जा सकते।

पपीते के बीज फेंकना कीजिए बंद, दिल से लेकर पेट तक की मुश्किलें चुटकी में कर देगा कम, जानें जबरदस्त फायदे

अक्सर लोग पपीता खाते वक्त उसके बीज बिना सोचे-समझे फेंक देते हैं, लेकिन न्यूट्रिशन एक्सपर्ट विधि चावला के अनुसार यही बीज सेहत का छुपा हुआ खजाना हैं. फाइबर, जरूरी मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर पपीते के बीज वजन घटाने से लेकर कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल, इम्युनिटी मजबूत करने और हार्मोन संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं.

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