तरबूज की खेती दो तरीकों से की जा सकती है. सीधे खेत में बीज बोकर या नर्सरी में पौध तैयार कर ट्रांसप्लांट करके. डॉ. राजीव कुमार ने सलाह दी कि बीज को पहले नर्सरी में बोया जाए और 12 से 15 दिनों के भीतर जब पौधे मजबूत हो जाएं, तब उन्हें मुख्य खेत में रोपित किया जाए. इस विधि से पौधों का विकास...
राजगढ़ जिले के खिलचीपुर में आयोजित होने वाले बसंत महोत्सव सनातनी मेले की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। इस वर्ष मेले की खास बात कुंभ की तर्ज पर तीन शाही स्नान का आयोजन और योग गुरु बालकृष्ण के गुरु अवधूत डॉ. स्वामी रघुनाथनंद के आगमन को लेकर उत्साह है। सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर रविवार रात बड़ा मेला ग्राउंड में बैठक कर विस्तृत समीक्षा की गई। तीन तिथियों पर होंगे शाही स्नान समिति के अनुसार पहला शाही स्नान 14 मार्च को मीन संक्रांति और एकादशी के अवसर पर होगा। दूसरा शाही स्नान 17 मार्च को वारुणी पर्वयोग एवं त्रयोदशी पर आयोजित किया जाएगा। तीसरा और अंतिम शाही स्नान 2 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा पर संपन्न होगा। इन तिथियों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। यज्ञशाला, प्रवचन और मनोरंजन की विशेष व्यवस्था मेले का यह दूसरा वर्ष है और इस बार आयोजन का स्वरूप पहले से अधिक भव्य किया गया है। बड़ा मेला ग्राउंड में दो विशाल यज्ञशालाएं बनाई गई हैं, जहां वैदिक अनुष्ठान होंगे। एक बड़े डोम में प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। मेले में दुकानों की संख्या बढ़ाई गई है और मनोरंजन के लिए झूले भी लगाए जा रहे हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, 50 से अधिक सीसीटीवी कैमरे आयोजन को सुरक्षित और व्यवस्थित रखने के लिए पूरे मेला परिसर में 50 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। बैठक में सुरक्षा, यातायात, पेयजल, साफ-सफाई और भीड़ नियंत्रण पर विस्तार से चर्चा की गई। आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता सहित समिति सदस्य, ग्रामीण और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। समिति ने विश्वास जताया है कि यह आयोजन धार्मिक आस्था और सामाजिक सहभागिता का सुरक्षित और सफल संगम बनेगा।
मथुरा- वृंदावन में आज भी सात दिन तक तरह-तरह से होली मनायी जाती है. वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में होली से पहले एकादशी के दिन रंगों की जगह फूलों की पंखुड़ियों से होली खेली जाती है. बरसाने के श्रीजी मंदिर में लड्डुओं की होली मनती है. वहां की लठमार होली देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. स्त्रियां हाथों में लट्ठ या डंडा पकड़े उन लोगों को पीटती हैं, जो उन पर रंग डालने आते हैं. गांव में जलाने वाली होली के अगले दिन की होली को गांव में धूल कहा जाता था. इसे कहीं-कहीं धुलंडी भी कहते हैं. The post स्त्री सशक्तीकरण की मिसाल है होली, पढ़ें क्षमा शर्मा का आलेख appeared first on Prabhat Khabar.
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