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विराग गुप्ता का कॉलम:बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की मुहिम तेज हुई है

ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को संयुक्त राष्ट्र सहित यूरोप के कई देशों ने समर्थन दिया है। भारत में भी दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्त 2013 में केएन गोविंदाचार्य मामले में आदेश पारित किया था कि नाबालिग बच्चे सोशल मीडिया जॉइन नहीं कर सकते। इस पर कभी अमल नहीं हुआ। इंटरनेट की दुनिया में परिपक्वता के बगैर बच्चों का निर्बाध प्रवेश, सामाजिक ताने-बाने के साथ देश की आर्थिक प्रगति को अवरुद्ध कर सकता है। इससे जुड़े 7 पहलुओं को समझना जरूरी है : 1. ऑनलाइन खतरों से 13 साल से कम उम्र के बच्चों को बचाने के लिए अमेरिका में 1998 में कानून बना था। ऑनलाइन बुलीइंग और सेक्सटॉर्शन स्कैम में फंसे बच्चों की मौत के बाद ऑस्ट्रेलिया ने 2024 में कानून बनाया, जो अब लागू हुआ है। इसके अनुसार 16 साल से कम उम्र के बच्चे टिक-टॉक, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब समेत 10 प्लेटफॉर्म जॉइन नहीं कर सकते। कानून का उल्लंघन करने वाली कम्पनियों के खिलाफ 3 अरब रु. का जुर्माना लग सकता है।2. देश में 18 साल से कम उम्र के नाबालिग बच्चे सिम कार्ड नहीं खरीद सकते और उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं मिल सकता। बच्चों को गुटखा, शराब आदि हानिकारक पदार्थ बेचने वालों के खिलाफ पुलिस मुकदमा दर्ज कर लेती है। कॉन्ट्रेक्ट एक्ट और डेटा सुरक्षा कानून के अनुसार कम्पनियां बच्चों का डेटा हासिल नहीं कर सकतीं। ऑनलाइन दुनिया में यौन-शोषण और पोर्नोग्राफी से बच्चों को बचाने के खिलाफ भारत में भी अनेक कानून हैं।3. मेटा का 19% से अधिक राजस्व ठगी और प्रतिबंधित कंटेंट के विज्ञापनों से आ रहा है। मेटा के प्रोजेक्ट मर्करी की रिपोर्ट के अनुसार सोशल मीडिया से बच्चों की मानसिक सेहत और शैक्षणिक क्षमताओं पर दुष्प्रभाव पड़ता है। टेक कम्पनियों का एक तिहाई कारोबार बच्चों से होता है। नुकसान से बचने के लिए मेटा ने इस रिपोर्ट को दबा दिया, लेकिन वह लीक हो गई। उसके बाद स्कूल, अभिभावक और कई राज्यों ने कैलिफोर्निया की अदालत में मुकदमा दायर किया। तब ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में टेक कम्पनियों के चंगुल से बच्चों को छुड़ाने की मुहिम तेज हुई।4. ऑस्ट्रेलिया में कक्षा-10 के शैक्षणिक मापदंड में 72% बच्चों के असफल होने की रिपोर्ट के बाद सोशल मीडिया का मामला राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया। किशोर औसतन 5 घंटे रोज सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार सोशल मीडिया, मीम और एआई चैटबॉट्स ने बच्चों की बोलने और लिखने की क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित किया है। उनका मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक भागीदारी और कैरियर प्रभावित हो रहा है।5. प्रतिबंध के बावजूद बच्चे लॉग-आउट मोड में सोशल मीडिया देख सकते हैं। जेन-जी ने स्नैप-चैट, रेडिट, डिस्कार्ड जैसे सीक्रेट अड्डे तलाश लिए हैं और वे डिजिटल फुटप्रिंट्स को भी नियमित खत्म कर रहे हैं। कई स्मार्ट बच्चे परिवार, दोस्त और अंजान लोगों से सम्पर्क रखने के लिए तीन एकाउंट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। वीपीएन और डार्क वेब की दुनिया में बच्चों को रोकने के लिए कानून से ही काम नहीं चलेगा।6. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कहा है कि नए कानून से ऑनलाइन सुरक्षा मिलने के साथ बच्चों का बचपन वापस आएगा। इस सांस्कृतिक बदलाव को सफल बनाने के लिए उन्होंने समाज के साथ राज्यों के नेताओं का भी धन्यवाद किया है। उन्होंने बच्चों से कहा है कि मोबाइल पर समय बिताने के बजाय वे संगीत सीखें, किताबें पढ़ें, दोस्तों के साथ खेलें और परिवारजनों के साथ अच्छा समय बिताएं।7. भारत में 18 से कम उम्र के 45 करोड़ बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को रोकने के लिए वेरिफिकेशन की मांग हो रही है। इसके लिए सेल्फी, आईडी या बायोमैट्रिक इकट्ठा करने की इजाजत मिली तो डेटा के दुरुपयोग से बच्चों की डिजिटल सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इस पर पाबंदी लगाने के लिए टेक कंपनियों से जुर्माना वसूलने वाला डेटा सुरक्षा कानून लागू करना होगा। जब तमाम दूसरी हानिकारक चीजों पर प्रतिबंध है तो सोशल मीडिया को भी उसी श्रेणी में क्यों न रखा जाए? संसद भवन में ई-सिगरेट पीने पर विवाद है। दिल्ली समेत दूसरे शहरों में प्रदूषण से रोकथाम के लिए अनेक प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। लेकिन देश के भविष्य बच्चों को ही डिजिटल प्रदूषण से बचाने वाले मानकों पर अमल नहीं हो रहा है।(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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