Karate winners Aniket Gupta and Deepika Dhiman were welcomed by the department.
प्रेग्नेंसी डायबिटीज, जिसे मेडिकल भाषा में गर्भकालीन मधुमेह कहा जाता है. अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि यह सिर्फ प्रेग्नेंसी तक सीमित समस्या है और बच्चे के जन्म के बाद खत्म हो जाती है, लेकिन हाल के शोध बताते हैं कि यह स्थिति सिर्फ मां के लिए ही नहीं बल्कि बच्चे के भविष्य के स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर प्रेग्नेंसी के दौरान मां का ब्लड शुगर स्तर लंबे समय तक ज्यादा बना रहता है, तो इसका असर बच्चे के मस्तिष्क, शरीर की ग्रोथ और भविष्य की सेहत पर पड़ सकता है, इसलिए इसे समय रहते पहचानना और सही तरीके से नियंत्रित करना बेहद जरूरी है. भारत में तेजी से बढ़ रही है प्रेग्नेंसी डायबिटीज के कारणपिछले कुछ वर्षों में भारत में प्रेग्नेंसी डायबिटीज के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है. अब लगभग हर चार में से एक प्रेग्नेंसी में यह समस्या सामने आ रही है. इसके पीछे कई कारण माने जा रहे हैं, जैसे बढ़ता मोटापा फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से कंसीव करना, परिवार में पहले से डायबिटीज का इतिहास और भारतीय लोगों में डायबिटीज के जेनेटिक. डॉक्टरों के अनुसार, कई महिलाएं प्रेग्नेंसी से पहले ही प्रीडायबिटीज या बिना पता चले टाइप-2 डायबिटीज से प्रभावित हो सकती हैं, ऐसे में प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज होने का खतरा और बढ़ जाता है. प्रेग्नेंसी डायबिटीज क्या होती है? जब किसी महिला को पहले से डायबिटीज नहीं होती, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान उसका ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है, तो उसे प्रेग्नेंसी डायबिटीज कहा जाता है. यह समस्या आमतौर पर प्रेग्नेंसी के 24 से 28 सप्ताह के बीच सामने आती है. इसी समय बच्चे का मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम तेजी से विकसित हो रहा होता है, इसलिए इस दौरान ब्लड शुगर का संतुलन बहुत जरूरी होता है. प्रेग्नेंसी में हार्मोनल बदलाव के कारण शरीर में इंसुलिन का असर कम हो सकता है. अगर पैंक्रियाज पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता, तो ब्लड में शुगर की मात्रा बढ़ने लगती है और यही स्थिति प्रेग्नेंसी डायबिटीज बन जाती है, समस्या यह है कि ज्यादातर मामलों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते. इसलिए नियमित जांच के बिना इसका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. इसे भी पढ़ें- Heart Disease Risk: कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक का खतरा? सावधान! ये कारण हो सकता है असली विलेन बच्चे पर कैसे पड़ता है असरमां के ब्लड शुगर का असर सीधे बच्चे पर पड़ता है. गर्भ में मौजूद प्लेसेंटा के जरिए ग्लूकोज बच्चे तक पहुंचता है. अगर मां का ब्लड शुगर ज्यादा रहता है, तो बच्चे के शरीर में भी शुगर की मात्रा बढ़ जाती है. ऐसे में बच्चे का पैंक्रियाज अतिरिक्त इंसुलिन बनाना शुरू कर देता है. यह स्थिति बच्चे के शरीर और अंगों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती है. कुछ शोध बताते हैं कि ऐसे बच्चों में आगे चलकर ध्यान की कमी की समस्या, व्यवहार संबंधी चुनौतियां, मोटर स्किल्स में देरी, कुछ मामलों में मिर्गी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है. हालांकि हर बच्चे में ऐसा होना जरूरी नहीं है, लेकिन ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने से इन जोखिमों को काफी कम किया जा सकता है. जन्म के बाद भी हो सकती हैं समस्याएंगर्भ में रहते हुए बच्चा ज्यादा शुगर को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा इंसुलिन बनाता है, लेकिन जन्म के बाद जैसे ही गर्भनाल कटती है, शुगर की अतिरिक्त आपूर्ति अचानक बंद हो जाती है. इससे नवजात शिशु में ब्लड शुगर अचानक कम हो सकता है, जिसे नवजात हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है. इसके कारण बच्चे में कमजोरी, घबराहट, दूध पीने में परेशानी, गंभीर मामलों में दौरे जैसी समस्याएं हो सकती हैं, ऐसे बच्चों में बड़े होकर मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा ज्यादा हो सकता है. वैज्ञानिक इसे फीटल प्रोग्रामिंग कहते हैं, जिसमें गर्भ में मौजूद वातावरण भविष्य में शरीर के मेटाबॉलिज्म और जीन के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकता है. कैसे करें प्रेग्नेंसी डायबिटीज को कंट्रोलप्रेग्नेंसी डायबिटीज को सही तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है. डॉक्टर आमतौर पर सलाह देते हैं कि फाइबर से भरपूर डाइट करें और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम लें. नियमित हल्की एक्सरसाइज जैसे रोजाना 20–30 मिनट टहलना. डॉक्टर की सलाह के अनुसार शुगर लेवल मॉनिटर करें, कुछ मामलों में इंसुलिन थेरेपी दी जाती है, जो प्रेग्नेंसी में सुरक्षित मानी जाती है.इसे भी पढ़ें- Benefits Of Drinking Water: चाय-कॉफी से नहीं मिटेगी शरीर की प्यास, डिहाइड्रेशन से बचने के लिए अपनाएं ये आदतेंDisclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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